ⓘ मुक्त ज्ञानकोश. क्या आप जानते हैं? पृष्ठ 189

अवग्रह

अवग्रह एक देवनागरी चिह्न है जिसका प्रयोग संधि-विशेष के कारण विलुप्त हुए अ को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। जैसे प्रसिद्ध महावाक्य सोऽहम् में। पाणिनीय व्याकरण में इसके संबंध में नियम है- अर्थात्- पद के अन्त में ए/ओ के बाद यदि अकार आये तो अका ...

अव्यय

किसी भी भाषा के वे शब्द अव्यय कहलाते हैं जिनके रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पत्र नहीं होता। ऐसे शब्द हर स्थिति में अपने मूलरूप में बने रहते है। चूँकि अव्यय का रूपान्तर नहीं होता, इसलिए ऐसे शब्द अविकारी होते हैं ...

अष्टाध्यायी

अष्टाध्यायी महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है। इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं; प्रत्येक पाद में 38 से 220 तक सूत्र हैं। इस प्रकार अष्टाध्यायी में आठ अध्याय, बत्तीस पाद और सब मिलाकर लगभग ...

आगम (भाषा संबंधी)

भाषा संबंधी आगम एक प्रकार का भाषायी परिवर्तन है। इसका संबंध मुख्य रूप से ध्वनिपरिवर्तन से है। व्याकरण की आवश्यकता के बिना जब किसी शब्द में कोई ध्वनि बढ़ जाती है तब उसे आगम कहा जाता है। यह एक प्रकार की भाषायी वृद्धि है। उदाहरणार्थ "नाज शब्द के आगे ...

आगम (भाषा सम्बन्धी)

आगम एक प्रकार का भाषायी परिवर्तन है। इसका संबंध मुख्य रूप से ध्वनिपरिवर्तन से है। व्याकरण की आवश्यकता के बिना जब किसी शब्द में कोई ध्वनि बढ़ जाती है तब उसे आगम कहा जाता है। यह एक प्रकार की भाषायी वृद्धि है। उदाहरणार्थ "नाज शब्द के आगे "अ-ध्वनि जो ...

इच्छावाचक वाक्य

नववर्ष मंगलमय हो। Ishwar tumhari aayu lambi kre. दूधोँ नहाओ, पूतोँ फलो। nav varsh ku shubhkamnaayein Om Prabhh. कल्याण हो। ईश्वर करे, सब कुशल लौटें। भगवान तुम्हें दीर्घायु करे। happy new year| व्यख्या इन वाक्योँ में वक्ता ईश्वर से दीर्घायु, नववर् ...

उणादि सूत्र

उणादिसूत्र का अर्थ है: उण् से प्रारंभ होने वाले कृत् प्रत्ययों का ज्ञापन करनेवाले सूत्रों का समूह। कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् यह उणादि का प्रारंभिक सूत्र है। शाकटायन को उणादिसूत्रों का कर्ता माना जाता है किन्तु स्व. प्राध्यापक का॰ बा॰ पाठक के ...

ऐन्द्र व्याकरण

ऐंद्र व्याकरण को कुछ लोग पाणिनि के पूर्व का मानते हैं। किंतु यह मत असंदिग्ध नहीं है। बर्नल के अनुसार ऐंद्र व्याकरण का संबंध कातंत्र से और तमिल के प्राचीनतम व्याकरण तोल्काप्पियम से है। ऐंद्र व्याकरण के आधापर सातवाहन युग में शर्व वर्मा ने कातंत्र व ...

कारक

रूपविज्ञान के सन्दर्भ में, किसी वाक्य, मुहावरा या वाक्यांश में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ उनके सम्बन्ध के अनुसार रूप बदलना कारक कहलाता है। अर्थात् व्याकरण में संज्ञा या सर्वनाम शब्द की वह अवस्था जिसके द्वारा वाक्य में उसका क्रिया के साथ स ...

काल (व्याकरण)

साँचा:Grammatical categories व्याकरणिक काल किसी भी स्थिति या क्रिया के समय को क्रियापद के द्वारा, पर, के दौरान या से परे व्यक्त करनेवाली एक कालिक भाषावैज्ञानिक गुणवत्ता है। काल भाव, आवाज़ और पहलू के साथ, चार गुणों में से कम से कम एक है, जो अभिव्य ...

काशिकावृत्ति

संस्कृत व्याकरण के अध्ययन की दो शाखाएँ हैं - नव्य व्याकरण, तथा प्राचीनव्याकरण। काशिकावृत्ति प्राचीन व्याकरण शाखा का ग्रन्थ है। इसमें पाणिनिकृत अष्टाध्यायी के सूत्रों की वृत्ति लिखी गयी है। इसके सम्मिलित लेखक जयादित्य और वामन हैं। सिद्धान्तकौमुदी ...

तत्सम

तत्सम आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त ऐसे शब्द जिनको संस्कृत से बिना कोई रूप बदले ले लिया गया है। हिन्दी, बांग्ला, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगू कन्नड, मलयालम, सिंहल आदि में बहुत से शब्द संस्कृत से सीधे ले लिए गये हैं क्योंकि इनमें से ...

तोल्काप्पियम्

तोल्कापपियम्, तमिल व्याकरण का प्राचीन ग्रन्थ है। यह नूरपा के रूप में रचित है। इसके तीन भाग हैं- एझुत्ताधिकारम्, सोल्लाधिकाराम् और पोरुलाधिकारम्। प्रत्येक भाग में नौ-नौ अध्याय हैं। इसका रचनाकाल ठीक-ठीक पता नहीं है किन्तु भाषा-सम्बन्धी एवं अन्य प्र ...

निषेध (तर्क)

तर्क के रूप में निषेध जिसे पूरक भी कहा जाता है एक संक्रिया है जो कथन को इसके p असत्य है तब निषेध p सत्य होगा। अतः निषेध एकधारी तर्क संयोजक है।

निषेधवाचक वाक्य

एक ऐसा सन्देश जो किसी काम को न करने का आदेश दे रहा हो, वह निषेधवाचक वाक्य कहलाता है। इन वाक्यों में प्रायः न, नहीं या मत जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। नहीं का प्रयोग सामान्यतः सभी स्थितियों में किया जाता है, लेकिन मत का प्रयोग प्रायः आज्ञाव ...

निष्कपटता

निष्कपता, निष्कपट शब्द का विशेषण रूप है एवं यह कुटिलता का विरोधी भाव है। निष्कपटता शब्द का उपयोग सामान्यतः किसी व्यक्ति के भावों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। लेकिन कभी-कभी इसका उपयोग किसी संस्था अथवा किसी संगठन के लिए भी किया जाता है।

पूर्ण विराम

संस्कृत, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वाक्य के अन्त में जो विराम चिह्न उपयोग में लाया जाता है उसे पूर्ण विराम कहते हैं। हिन्दी में इसे खड़ी पाई भी कहते हैं। देवनागरी लिपि में इसके लिए चिह्न का प्रयोग होता है। कुछ लोग एवं प्रकाशन इसके स्थान पर ...

प्रजनक व्याकरण

प्रजनक व्याकरण एक भाषावैज्ञानिक सिद्धान्त है जो यह मानता है कि व्याकरण कुछ नियमों का एक ऐसा समूह है जो शब्दों का ठीक-ठीक वही क्रम उत्पन्न करेगा जो किसी प्राकृतिक भाषा में व्याकरनसम्मत वाक्य के रूप में विद्यमान हों। 1965 में नोआम चाम्सकी ने अपनी प ...

प्रत्यय

प्रत्यय वे शब्द हैं जो दूसरे शब्दों के अन्त में जुड़कर, अपनी प्रकृति के अनुसार, शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं। प्रत्यय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – प्रति + अय। प्रति का अर्थ होता है ‘साथ में, पर बाद में" और अय का अर्थ है "चलने वाला", ...

प्रत्याहार

पतंजलि के अष्टांग योग के सन्दर्भ में प्रत्याहार का अलग अर्थ है। यहाँ प्रत्याहार को पाणिनीय व्याकरण के सन्दर्भ में दिया गया है। bi Baak Whwu प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन। व्याकरण में प्रत्याहार विभिन्न वर्ण-समूह को अभीप्सित रूप से सं ...

प्रश्न

किसी सूचना या जानकारी की प्राप्ति के लिये या किसी शंका के समाधान के लिये प्रयुक्त भाषायी अभिव्यक्ति को प्रश्न कहते हैं। प्रश्न पूछने के लिये प्रत्येक भाषा में एक अलग प्रकार के वाक्य प्रयुक्त होते हैं जिन्हें प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैं। सूचना या जा ...

फिट्सूत्र

फिट्सूत्रों संख्या में 87 हैं और चार पादों में विभक्त हैं - अन्तोदात्त, आद्युदात्त, द्वितीयोदात्त, पर्यायोदात्त। फिट् का शब्दशः अर्थ है - प्रातिपदिक। इन सूत्रों में शब्दों के स्वर संचापर विचार है। प्रतिपदिकों के लिए नैसर्गिक क्रम से उपयोजित उदात् ...

भट्टोजि दीक्षित

भट्टोजी दीक्षित १७वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होने सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इनका निवासस्थान काशी था। पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन की प्राचीन परिपाटी में पाणिनीय सूत्रपाठ के क्रम को आधार माना जाता था। यह क्रम प्रयोगसिद्धि की दृष ...

महाप्रणिकरण

जब अल्प प्राण ध्वनियाँ महाप्राण ध्वनियों में परिवर्तित हो जाती है,उसे महाप्रणिकरण कहते है। जैसे,शुष्क-सूखा, वेष-भेष यहाँ पहले शब्द में कके स्थान पर खहो गया है तथा दूसरे शब्द मेंवके स्थान पर भहो गया है।इस प्रकार अल्प प्राणिकरण से महाप्रणिकरण की प् ...

मात्राभार

छंदबद्ध रचना के लिये मात्राभार की गणना का ज्ञान आवश्यक है। मात्राभार दो प्रकार का होता है– वर्णिक भाऔर वाचिक भार। वर्णिक भार में प्रत्येक वर्ण का भार अलग-अलग यथावत लिया जाता है जैसे– विकल का वर्णिक भार = 111 या ललल जबकि वाचिक भार में उच्चारण के अ ...

लक्षणा

लक्षणा शब्द शक्ति – जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा उपस्थित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधापर मुख्य अर्थ से संबंधित अन्य अर्थ को लक्ष्य किया जाता है, वहाँ लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे – मोहन गधा है | यहाँ गधे का लक्ष्यार्थ है मूर्ख | आचार्य मम्मट ...

लघुसिद्धान्तकौमुदी

लघुसिद्धान्तकौमुदी पाणिनीय संस्कृत व्याकरण की परम्परागत प्रवेशिका है। यह विद्वन्मान्य वरदराज की रचना है जो भट्टोजि दीक्षित के शिष्य थे। उनका एक व्याकरण ग्रन्थ मध्यसिद्धान्तकौमुदी भी है। लघुसिद्धान्तकौमुदी में पाणिनि के सूत्रों को एक नए क्रम में र ...

वचन (व्याकरण)

भाषाविज्ञान में वचन एक संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया आदि की व्याकरण सम्बन्धी श्रेणी है जो इनकी संख्या की सूचना देती है । अधिकांश भाषाओं में दो वचन ही होते हैं- एकवचन तथा बहुवचन, किन्तु संस्कृत तथा कुछ और भाषाओं में द्विवचन भी होता है।

वर्ण परिचय

१. वर्णविचार प्रस्ताविक जानकारी भाषा मे कर्ता Subject", "कर्म Object" और क्रिया Verb" इन को लेके वाक्य बनता है। कभी कर्म रहेगा कभी नहीं रहेगा। एक वाक्य लेते है। बालक पुस्तक पढ़ता है। इस वाक्य में बालक कर्ता Subject" है, पुस्तक "कर्म Object" है और ...

मानक हिंदी वर्तनी

हिन्दी की वर्तनी के विविध पहलुओं को लेकर १९वीं शताब्दी के अन्तिम चरण से ही विविध प्रयास होते रहे हैं। इसी तारतम्य में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा वर्ष 2003 में देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी के मानकीकरण के लिए अखिल भारतीय संगोष्ठी का आयोजन किय ...

वाक्यपदीय

वाक्यपदीय, संस्कृत व्याकरण का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। वाक्यपदीय, व्याकरण शृंखला का मुख्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसके रचयिता नीतिशतक के रचयिता महावैयाकरण तथा योगिराज भर्तृहरि हैं। इनके गुरु का नाम वसुरात था। भर्तृहरि को किसी ...

वाच्य

क्रिया के उस परिवर्तन को वाच्य कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का बोध होता है कि वाक्य के अन्तर्गत कर्ता, कर्म या भाव में से किसकी प्रधानता है। इनमें किसी के अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि आए हैं। वाच्य के तीन प्रकार हैं - कर्तृवाच्य Active Voice ...

विधान वाचक वाक्य

जिन वाक्योँ में क्रिया के करने या होने का बोध हो और ऐसे वाक्योँ में किसी काम के होने या किसी के अस्तित्व का बोध होता हो, उन्हें विधिवाचक या विधानवाचक वाक्य कहते हैं।

विभक्ति

विभक्ति का शाब्दिक अर्थ है - विभक्त होने की क्रिया या भाव या विभाग या बाँट। व्याकरण में शब्द संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण के आगे लगा हुआ वह प्रत्यय या चिह्न विभक्ति कहलाता है जिससे पता लगता है कि उस शब्द का क्रियापद से क्या संबंध है। संस्कृत व्याकर ...

विराम (चिन्ह)

विराम शब्द वि + रम् + घं से बना है और इसका मूल अर्थ है "ठहराव", "आराम" आदि के लिए। जिन सर्वसंमत चिन्हों द्वारा, अर्थ की स्पष्टता के लिए वाक्य को भिन्न भिन्न भागों में बाँटते हैं, व्याकरण या रचनाशास्त्र में उन्हें "विराम" कहते हैं। "विराम" का ठीक ...

विस्मयादिवाचक वाक्य

छिः! कितना गन्दा दृश्य! शाबाश! बहुत अच्छे! ओह! बड़ा जुल्म हुआ! अरे! इतनी लम्बी रेलगाड़ी! व्याख्या उक्त वाक्यों में आश्चर्य अरे, दुःख ओह, घृणा छिः, हर्ष शाबाश आदि भाव व्यक्त किगए हैँ अतः ये विस्मयादिबोधक वाक्य हैँ।

वैयाकरण

पाणिनि लगभग ५०० ई॰ पू॰ संस्कृत के सबसे प्रसिद्ध तथा सम्मानित वैयाकरण हुये हैं। उनका ग्रन्थ अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सबसे प्रतिष्ठित ग्रन्थ है। पाणिनि के पूर्ववर्ती वैयाकरणों में यास्क, शाकटायन, शौनक, शाकल्य, स्फोटायन आदि हुये हैं। पाणिनि के ...

व्याकरण (वेदांग)

वेदाङ्ग छः हैं, जिसमें से व्याकरण एक है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप में जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अधययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है। इसके मूलतः पाँच प्रयोजन हैं - रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंद ...

शब्दानुशासन

आचार्य हेमचंद्र ने समस्त व्याकरण वांड्मयका अनुशीलन कर शब्दानुशासन एवं अन्य व्याकरण ग्रंथोकी रचना की। पूर्ववतो आचार्यों के ग्रंथो का सम्यक अध्ययन कर सर्वाङ्ग परिपूर्ण उपयोगी एवं सरल व्याकरण की ‍रचना कर संस्कृत और प्राकृत दोनों ही भाषाओं को पूर्णतय ...

संज्ञा

भाषा विज्ञान में, संज्ञा एक विशाल, मुक्त शाब्दिक वर्ग का सदस्य है, जिसके सदस्य वाक्यांश के कर्ता के मुख्य शब्द, क्रिया के कर्म, या पूर्वसर्ग के कर्म के रूप में मौजूद हो सकते हैं। शाब्दिक वर्गों को इस संदर्भ में परिभाषित किया जाता है कि उनके सदस्य ...

संदेहवाचक वाक्य

kya use sadi me main ja sakta hu ;व्याख्या:उक्त वाक्योँ में कार्य के होने में अनिश्चितता व्यक्त हो रही है अतः ये संदेह वाचक वाक्य हैँ। शायद वह मान जाए। सम्भवतः वह सुधर जाए। शायद मैँ कल बाहर जाऊँ। आज वर्षा हो सकती है। == सन्दर्भ ==फगधजटंन

संधि-विच्छेद संग्रह

दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है। हिंदी भाषा में संधि द्वारा संयुक्त शब्द लिखने का सामान्य चलन नहीं है। पर संस्कृत में इसके बिना काम नहीं चलता ...

संस्कृत व्याकरण

संस्कृत में व्याकरण की परम्परा बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप में जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है वेदांग यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च। यस्य ...

संस्कृत व्याकरण का इतिहास

संस्कृत का व्याकरण वैदिक काल में ही स्वतंत्र विषय बन चुका था। नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात - ये चार आधारभूत तथ्य यास्क के पूर्व ही व्याकरण में स्थान पा चुके थे। पाणिनि के पहले कई व्याकरण लिखे जा चुके थे जिनमें केवल आपिशलि और काशकृत्स्न के कुछ सूत ...

समूहवाचक संज्ञा (अंग्रेजी व्याकरण)

भाषा विज्ञान में, समूहवाचक संज्ञा वह शब्द है जिसका इस्तेमाल वस्तुओं के समूह को परिभाषित करने के लिए किया जाता है, व जिसमें व्यक्ति, पशु, भावनाएं, निर्जीव वस्तु, अवधारणाएं या अन्य चीजें हो सकती है। उदाहरण के लिए, "ए प्राइड ऑफ लॉयन्स", वाक्यांश में ...

शब्दकोश

अनुवाद
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